उम्मीद थी कि तुमसे मिलूँगा लेकिन क्या करू अब आस रही नहीं जो पहले थी जो उम्मीद थी कई सालों से अब वो ढलान से गुजर रही हैं क्या पता किसी पत्थर के ठोखर से यह आप ना खो दे और टूट जाए उम्मीद थी की तुमसे मिलूँगा. अक्सर देखता हूँ टूटते- बनते रिश्तों कोContinue reading “उम्मीद थी कि तुमसे मिलूँगा…”